माघ मेले का विवाद: क्या शंकराचार्य से माफी मांगकर खत्म होगा प्रयागराज का टकराव?
सालाना प्रयागराज का माघ मेला आस्था और परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र बनता है। संगम में लाखों लोग स्नान करते हैं। श्रद्धालु, संत और साधु दूर-दूर से आते हैं। लेकिन इस बार माघ मेले में सुरक्षा को लेकर एक बड़ा विवाद हुआ। प्रशासन और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने यह बहस की। मामला इतना बढ़ गया कि अचानक शंकराचार्य ने प्रयागराज छोड़ दिया। समाचारों के अनुसार, प्रशासन अब उनसे माफी मांगने को तैयार है। सवाल यह है कि क्या इससे बहस समाप्त होगी या नहीं।
विवाद कैसे शुरू हुआ?
माघ मेले में मौनी अमावस्या का दिन बहुत पवित्र है। इसी दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने पालकी और रथ से संगम नोज की ओर चले गए। रास्ते में भारी भीड़ थी। सुरक्षित रहने की चिंता बढ़ी है। यही कारण था कि प्रशासन ने उनसे रथ से उतरकर पैदल चलने को कहा।
शंकराचार्य के समर्थकों को यह पसंद नहीं आया। वे रथ को चलाना चाहते थे। इसके बाद पुलिस और समर्थकों के बीच झगड़ा हुआ। अचानक माहौल तनावपूर्ण हो गया। जुलूस वहीं रोका गया। शंकराचार्य ने कहा कि उन्हें पवित्र स्नान से रोका गया था और उनके साथ बुरा व्यवहार किया गया था।
धरना और क्रोध
जुलूस समाप्त होने पर शंकराचार्य अपने आवास के बाहर धरने पर बैठ गए। उनका कहना था कि प्रशासन का व्यवहार दुखद होगा। उनका दावा था कि पालकी को बीच में रोक दिया गया था। उनके अनुयायियों को भी अन्याय हुआ। इस घटना ने उन्हें बहुत पीड़ा दी। साथ ही उन्होंने कहा कि ऐसे हालात में मौनी अमावस्या पर स्नान नहीं करेंगे। इस निर्णय से विवाद बढ़ा।
अचानक प्रस्थान करना
सरकार ने सोचा कि शंकराचार्य माघ पूर्णिमा तक प्रयागराज में रहेंगे। उन्हें उम्मीद थी कि बातचीत से कुछ होगा। लेकिन 28 जनवरी को श्रीकृष्ण अचानक प्रयागराज छोड़कर वाराणसी लौट गए। प्रशासन को यह कदम चौंकाने वाला था। वे नहीं जानते थे कि शंकराचार्य ऐसा निर्णय लेंगे। उनके जाने के बाद स्थिति और खराब हो गई।
प्रशासन में बदलाव
शंकराचार्य के वाराणसी आगमन के बाद परिस्थितियां बदलने लगी। दो वरिष्ठ अधिकारी लखनऊ से उनसे संपर्क में आए। पूर्णिमा के दिन उन्हें ससम्मान प्रयागराज लाया जाएगा और संगम स्नान कराया जाएगा, उन्होंने विनती की। बातचीत में शंकराचार्य ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे कुछ शर्तों को पूरा करने के बाद ही वापस आएंगे। पहली आवश्यकता थी कि जिम्मेदार अधिकारी लिखित में माफी मांगें। दूसरी शर्त थी कि चारों शंकराचार्यों को माघ मेला, कुंभ और महाकुंभ में स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
माफी की बात क्यों सामने आई?
प्रशासन को पहले माफी मांगने की इच्छा नहीं थी। न तो लिखित माफी स्वीकार की गई और न ही जिम्मेदारी स्वीकार की गई। यही बात शंकराचार्य को सबसे अधिक दुखी करती थी। प्रशासन का रुख अब नरम पड़ा है क्योंकि वे प्रयागराज छोड़ चुके हैं। खबर है कि प्रशासन विवाद को समाप्त करने और पारंपरिक भागीदारी को बचाने के लिए माफी मांगने को तैयार है। इससे पता चलता है कि मामले को हल करने की कोशिश की जा रही है।
आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस का महत्व क्यों?
आज सुबह 11 बजे श्री अविमुक्तेश्वरानंद एक प्रेस वार्ता करेंगे। सब लोग इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को देख रहे हैं। यह स्पष्ट हो सकता है कि क्या वे प्रशासन की पेशकश स्वीकार करेंगे या नहीं। शंकराचार्य कहते हैं कि फिलहाल काशी में स्नान करना उनका एकमात्र लक्ष्य है। वे गंगा में वहीं स्नान करेंगे। लेकिन वे प्रयागराज लौटने पर भी विचार कर सकते हैं अगर उनकी माँगें मानी जाती हैं।
वर्तमान बहस का मूल कारण
शंकराचार्य पक्ष का कहना है कि प्रशासन से 27 जनवरी को चर्चा हुई थी। उस समय उन्होंने स्पष्ट रूप से माफी मांगी थी। लेकिन पहले प्रशासन ने मना कर दिया। बाद में भी लिखित शिकायत नहीं की गई थी। यह बहस का कारण बन गया। शंकराचार्य ने कहा कि यह सम्मान का प्रश्न था। उनका कहना है कि संतों को ऐसा नहीं करना चाहिए।
परंपरा और सम्मान का प्रश्न
माघ मेला बस एक उत्सव नहीं है। परंपरा और श्रद्धा इससे जुड़ी हुई हैं। शंकराचार्य जैसे बड़े धार्मिक गुरु इसमें महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ऐसे में सम्मान और प्रोटोकॉल का प्रश्न उठना स्वाभाविक है। शंकराचार्य चाहते हैं कि ऐसे हालात फिर कभी नहीं होंगे। इसलिए वे स्पष्ट नियमों की मांग कर रहे हैं।
प्रयागराज प्रशासन में सामने आने वाली चुनौती
अब प्रयागराज प्रशासन सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है। एक ओर सुरक्षा और भीड़ का दबाव है। दूसरी ओर, मान्यताओं और सम्मान को बचाना होगा। विवाद शांत हो सकता है अगर प्रशासन माफी मांगता है और नियम बनाता है। लेकिन समस्या और बढ़ सकती है अगर कुछ नहीं होता।
भविष्य में क्या हो सकता है?
आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस सब कुछ है। शंकराचार्य संगम स्नान के लिए वापस जा सकते हैं अगर वे माफी स्वीकार करते हैं। इससे बहस समाप्त होने की उम्मीद है। अगर वे संतुष्ट नहीं होते, तो वे वाराणसी में रहेंगे और अपना विरोध जारी रख सकते हैं। इससे माघ मेला अलग दिखेगा।
उत्कर्ष
माघ मेले का यह बहस दिखाता है कि संवाद, व्यवस्था और आस्था का संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। यह मामला अकेले शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का नहीं है। परंपरा और सम्मान इसमें शामिल हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन की माफी और कार्रवाई इस बहस को कितना कम कर सकती है। आने वाले घंटों में सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।