ट्रंप के बड़े दावे और मोदी सरकार की चुप्पी: भारत-अमेरिका ट्रेड डील के तीन सवाल, जिन पर अभी भी सस्पेंस
पिछले कुछ समय से भारत-अमेरिका के रिश्ते में गिरावट आई है। कभी दोस्ती होती है, तो कभी व्यापार और टैरिफ पर तल्खी दिखती है। यही कारण था कि दो फरवरी, सोमवार को दोनों देशों ने एक नई ट्रेड समझौता घोषित किया, जिससे लोगों ने सोचा कि शायद दोनों देशों के बीच रिश्ते फिर से सुधरेंगे।
लेकिन समझौते को लेकर प्रश्न बढ़ते गए। सरकार ने डील की शर्तें क्या हैं, कब से लागू होंगी और भारत को इससे कितना लाभ या नुकसान होगा, इस पर स्पष्ट उत्तर नहीं दिया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े दावे किए। भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन दावों को अनदेखा कर दिया है।
इस लेख में हम उसी ट्रेड डील से जुड़े तीन सबसे महत्वपूर्ण सवालों को सरल भाषा में समझने की कोशिश करेंगे, ताकि हर पाठक मूल मुद्दा को स्पष्ट रूप से समझ सकें।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा और प्रारंभिक अनुमान
भारत और अमेरिका ने दो फरवरी को एक नए व्यापार समझौते की घोषणा की, जो संबंधों में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। हाल के महीनों में बयानबाज़ी के चलते रिश्तों में खटास आ गया था। ऐसे में यह घोषणा कुछ राहत की बात लगी। अगले दिन, भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पियुष गोयल ने कहा कि डील के अंतिम चरण की चर्चा चल रही है और सहमति होने पर पूरी जानकारी दी जाएगी।
लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रूथ सोशल नामक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जो कुछ लिखा, उसने कई नए प्रश्न उठाए। अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या ट्रंप की बातें इस डील के बारे में सही हैं?
पहला प्रश्न: क्या भारत रूस से तेल खरीदना छोड़ देगा?
राष्ट्रपति ट्रंप ने यही सबसे बड़ा वादा किया है। उनका कहना था कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा और अमेरिका से अधिक तेल खरीदेगा। उसने यह भी कहा कि भारत वेनेजुएला से तेल खरीद सकता है।
यह घोषणा सुनकर बहुत से लोग चौंक गए। कारण स्पष्ट है। भारत ने हमेशा कहा है कि वह अपनी ऊर्जा नीति चुनता है। भारत रूस से सस्ता तेल खरीदेगा अगर वह उपलब्ध होता है। देश की ऊर्जा सुरक्षा इसमें शामिल है।
भारत सरकार ने इस पर सीधा उत्तर नहीं दिया। न तो खंडन हुआ और न ही पुष्टि हुई। इसी चुप्पी ने विवाद को और भड़काया। यदि यह दावा सही है, तो कई अर्थशास्त्री भारत की नीति को बहुत बदल देगा। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का भाषण सिर्फ जनता के सामने सही रहेगा जब तक कि भारत सरकार स्पष्टीकरण नहीं देती।
साथ ही, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि भारत ने रूसी तेल की खरीद को पहले ही कम कर दिया है। लेकिन पूरी तरह से बंद करना या अमेरिका की मांग पर निर्णय बदलना अभी स्पष्ट नहीं है।
दूसरा प्रश्न: 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पादों को भारत खरीदेगा?
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर के उत्पाद खरीदेगा, जो उनके दावे का दूसरा बड़ा हिस्सा है। इसमें कृषि, ऊर्जा और तकनीक से जुड़े सामान बताए गए हैं।
यह आंकड़ा बहुत बड़ा लगता है। वास्तव में, भारत अमेरिका से हर साल 50 अरब डॉलर से भी कम की वस्तुएं आयात करता है। 500 अरब डॉलर तक पहुंचने में कई साल या शायद दशकों का समय लग सकता है।
कृषि क्षेत्र सबसे अधिक चिंता का विषय है। भारत में कृषि एक व्यापार है। यह करोड़ों लोगों की आय है। प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार कहा है कि किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं होगा। अमेरिका से अधिक कृषि उत्पाद आने से भारतीय किसान प्रभावित हो सकते हैं।
सरकार का कहना है कि संवेदनशील कृषि और डेयरी क्षेत्रों को कानून में सुरक्षा मिली है। लेकिन कितनी सुरक्षा और कैसे? जवाब अभी नहीं आया है।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप ने “आने वाले समय में” शब्दों का उपयोग किया है। इसका अर्थ हो सकता है कि यह एक लंबी अवधि का लक्ष्य है, न कि सिर्फ एक या दो साल का। फिर भी, यह दावा अधूरा ही रहेगा जब तक समयसीमा और परिस्थितियां स्पष्ट नहीं होतीं।
तीसरा प्रश्न: क्या भारत अमेरिका पर पूरा टैरिफ छोड़ देगा?
साथ ही, ट्रंप ने घोषणा की कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ और गैर-टैरिफ प्रतिबंधों को शून्य कर देगा। यानी अमेरिका से आयातित सामान भारत में आसानी से आ जाएगा।
यह दावा भी बहुत आश्चर्यजनक है। भारत अपने बाजार को लेकर हमेशा सतर्क रहा है। खासकर कृषि, जीएम खाद्य और छोटे उद्योगों में देश के छोटे उद्योगों और एमएसएमई सेक्टर को नुकसान हो सकता है अगर सभी टैरिफ अचानक हटा दिए जाएँ।
आज भारत पर अमेरिका का औसत 18 प्रतिशत टैरिफ लगा हुआ है। पहले यह करीब ढाई प्रतिशत था। यह सौदा भारत के लिए घाटे का हो सकता है अगर भारत अपने टैरिफ शून्य कर देता है और अमेरिका अपने टैरिफ ऊंचे रखता है।
यह भी वही प्रश्न है। किन उत्पादों से टैरिफ हट जाएगा? कितने समय में निकल जाएगा? क्या अन्य सेवाएं भी शामिल होंगी? समझौते के अंतिम संस्करण में इन सभी प्रश्नों का उत्तर छिपा है, जो अभी सार्वजनिक नहीं है।
सरकार की चुप्पी और अधिक विवाद
तीनों बड़े प्रश्नों में एक बात मिलती है। भारत सरकार ने कुछ नहीं कहा। ट्रंप के दावों का स्पष्ट खंडन या पूरी पुष्टि नहीं हुई है। सरकार का कहना है कि अंतिम समझौता होते ही सभी जानकारी दी जाएगी।
इस चुप्पी का बहुत मतलब निकलता है। कुछ लोगों का कहना है कि सरकार बोलने से बच रही है क्योंकि बातचीत अभी चल रही है। कुछ लोगों का मानना है कि सरकार बहस से बचना चाहती है।
क्या यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि राजनीति है?
बहुत से विश्लेषकों का मानना है कि यह सौदा सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। यह भू-राजनीतिक भी है। इस समझौते को रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन का बढ़ता प्रभाव और विश्व राजनीति में बदलते समीकरणों से प्रभावित किया जा सकता है।
अमेरिका में कृषि और ऊर्जा दो प्रमुख राजनीतिक मुद्दे हैं। वहीं भारत के छोटे उद्योगों, किसानों और ऊर्जा सुरक्षा पर सबसे अधिक ध्यान है। इसलिए संतुलन बनाना कठिन है।
अब क्या होगा?
फिर भी, सच्चाई पूरी तरह से स्पष्ट नहीं होगी जब तक डील का पूरा दस्तावेज नहीं मिलेगा। सवाल यह है कि क्या ट्रंप के दावे ज्यों-के-त्यों सही होंगे या क्या बातचीत के बाद स्थिति अलग होगी।
भारत और अमेरिका दोनों लोकतंत्र बड़े हैं। दोनों के लिए अलग-अलग लाभ हैं। सरकारें ही नहीं, आम लोग भी इस ट्रेड डील से प्रभावित होंगे। यह तेल की कीमतों, किसानों की आय और छोटे उद्योगों का भविष्य से जुड़ा हुआ है।
यही कारण है कि सरकार को इस समझौते में किए गए फैसले को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता, मोदी सरकार की चुप्पी और ट्रंप के दावे के बीच सवालों का यह सिलसिला जारी रहेगा।