भारत-जर्मनी की ऐतिहासिक डील: समंदर में बढ़ेगी भारत की ताकत
भारत-जर्मनी की ऐतिहासिक डील: समंदर में बढ़ेगी भारत की ताकत
भारत और जर्मनी के रिश्ते में एक नया और महत्वपूर्ण बदलाव आया है। दोनों देशों ने अब तक की सबसे बड़ी रक्षा समझौते पर काम कर रहे हैं। यह समझौता लगभग आठ बिलियन रुपये का है। इस सौदे से भारत को नई सबमरीन बनाने की कला और तकनीक भी मिलेगी। इससे भारत की समुद्री शक्ति बढ़ेगी और उसकी आत्मनिर्भरता में बड़ा सुधार होगा।
8 बिलियन डॉलर की सबमरीन डील का क्या अर्थ है?
भारत और जर्मनी एक बड़े सबमरीन उत्पादन समझौते को अंतिम रूप देने में लगे हैं। इस सौदे की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि यह टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को शामिल करता है। भारत में पहली बार आधुनिक सबमरीन बनाने की पूरी तकनीक का ज्ञान यानी को मिलेगा। अधिकारियों ने कहा कि यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी सुरक्षा सहमति हो सकती है।
यह निर्णय ऐसे समय में किया गया है जब जर्मनी के चांसलर फ्रिडरिक मेर्ज भारत की आधिकारिक यात्रा पर हैं। उसकी इस यात्रा से पहले ही दोनों देशों ने रक्षा सहयोग पर चर्चा शुरू कर दी थी।
भारतीय नौसेना की वर्तमान क्षमता
वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास लगभग बारह पुराने रूसी सबमरीन हैं। सात आधुनिक फ्रांसीसी सबमरीन भी सेवा में हैं। भारत तीन और फ्रांसीसी सबमरीन खरीदने की अपनी योजना को रद्द कर सकता है अगर जर्मनी के साथ यह नई समझौता लागू होता है।
नई परियोजना में जर्मनी की प्रसिद्ध कंपनी Thyssenkrupp Marine Systems GmbH और भारत की सरकारी कंपनी Mazagon Dock Shipbuilders Limited मिलकर सबमरीन बनाएंगे। अब तक भारत विदेशों से अधिकांश सबमरीन खरीदता रहा है, इसलिए यह भारत के लिए ऐतिहासिक होगा।
एयर-इंडिपेंडेंट प्रदान प्रणाली की शक्ति
नई सबमरीन में हवा-मुक्त प्रवाह प्रणाली बनाई जाएगी। आसान शब्दों में, यह प्रणाली सबमरीन को पानी के नीचे रहने में मदद करती है। नई तकनीक से पुराने डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन की आवश्यकता कम हो जाएगी।
इससे भारत को हिंद महासागर में अपनी समुद्री सीमा की निगरानी करने में बहुत मदद मिलेगी। खास तौर पर जब चीन इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है।
जर्मन चांसलर की भारत यात्रा की विशिष्टता
जर्मनी के चांसलर फ्रिडरिक मेर्ज ने भारत की पहली यात्रा की है। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुजरात में मुलाकात की। बाद में वे बेंगलुरु गए, जहां उन्होंने जर्मन कंपनियों और तकनीक के नेताओं से चर्चा की।
यह यात्रा भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत-जर्मनी की रणनीतिक साझेदारी के 25 साल 2025 में पूरे होंगे। वहीं, दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के 75 साल पूरे होने वाले हैं 2026 में।
संयुक्त सैन्य अभ्यास और नवीन सहयोग
भारत और जर्मनी ने फैसला किया है कि आने वाले समय में ज्यादा संयुक्त सैन्य अभ्यास करेंगे। इसमें थल, नौ और वायु सेना शामिल होंगी। सीनियर अधिकारियों के आदान-प्रदान और ट्रेनिंग पर भी जोर दिया जाएगा।
जर्मनी ने भारत के साथ अपना समुद्री सहयोग बढ़ाना चाहा है। वह हिंद महासागर में भारत की कोशिशों का समर्थन करेगा। इससे क्षेत्र की सुरक्षा बढ़ जाएगी।
रक्षा क्षेत्र में सहकारी उत्पादन का तरीका
लंबे समय से भारत चाहता है कि विदेशी हथियार कंपनियां भारत में ही हथियार बनाएँ। 2020 में सरकार ने बहुत से हथियारों के आयात पर भी प्रतिबंध लगाया था। इसका उद्देश्य था कि भारत अपने खुद के हथियार बनाए और बाहरी देशों पर निर्भर न रहे।
जर्मनी के साथ यह समझौता इसी नीति को बल देता है। इसमें को-विकास और को-निर्माण पर जोर है। यानी दोनों देश मिलकर उत्पादन और तकनीक विकसित करेंगे।
रूस पर अपनी निर्भरता कम करने का प्रयास
भारत आज भी हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश है। रूस अधिकांश हथियार बनाता है। यह भी स्टॉकहोम अंतर्राष्ट्रीय शान्ति अध्ययन संस्थान के आंकड़े बताते हैं।
यूक्रेन युद्ध के बाद जर्मनी का सैन्य उद्योग तेजी से विकसित हुआ है। जर्मनी चाहता है कि भारत आधुनिक हथियार बनाने में सक्षम हो और रूस पर अपनी निर्भरता कम करे। यह समझौता भी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
काउंटर-ड्रोन और नई तकनीक के साथ सहकार्य
भारत और जर्मनी ने काउंटर-ड्रोन सिस्टम और अनमैन्ड एरियल सिस्टम पर भी अधिक सहयोग करने का निर्णय लिया है। इससे सीमा सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी कार्रवाई में सुधार होगा।
भारत की एजेंसी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और यूरोपीय संगठन OCCAR के बीच तकनीकी सहयोग जारी रहेगा। भारत इससे नवीनतम सैन्य तकनीक प्राप्त करेगा।
आतंकवाद के खिलाफ कठोर रुख
दोनों देशों ने आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ने का वादा किया है। उन्होंने हिंसक उग्रवाद और आतंकवाद की कड़ी निंदा की है। दोनों स्पष्ट और कठोर हैं, खासकर सीमा पार आतंकवाद पर।
भारत और जर्मनी भी संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर आतंकवादियों और आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे।
नेट वर्थ और सोशल मीडिया प्रेजेंस
जर्मनी के चांसलर फ्रिडरिक मेर्ज भी सोशल मीडिया पर व्यस्त हैं। वे लिंक्डइन और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर अपनी राय और सरकारी निर्णय साझा करते हैं। इससे वे उद्यमी लीडर्स और युवाओं से सीधे जुड़े रहते हैं।
नेट वर्थ के मामले में, फ्रिडरिक मेर्ज जर्मनी के सबसे अमीर राजनेताओं में शामिल हैं। उनका राजनीतिक अनुभव भी है। लेकिन वे कहते हैं कि उनके लिए देश की सेवा सबसे महत्वपूर्ण है।
भारत-जर्मनी संबंधों में नवीनता
यह सबमरीन समझौता सिर्फ रक्षा के लिए नहीं है। यह भारत-जर्मनी संबंधों में सहयोग और विश्वास का संकेत है। इससे जर्मनी को एशिया में एक मजबूत साझेदार मिलेगा और भारत को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी।
आने वाले वर्षों में इस सहयोग का प्रभाव सिर्फ रक्षा में नहीं रहेगा। ऊर्जा, शिक्षा, व्यापार और तकनीक के क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ेगा। भारत और जर्मनी एक सुरक्षित और मजबूत भविष्य की ओर चल रहे हैं।