Swami Avimukteshwarananda

कैसे बने शंकराचार्य? 24 घंटे में दें जवाब: माघ मेला प्राधिकरण का स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस, विवाद ने लिया नया मोड़

प्रयागराज के माघ मेला क्षेत्र में चल रहा विवाद अब और गहरा हो गया है। मौनी अमावस्या के पावन स्नान पर्व पर शुरू हुई एक घटना ने प्रशासन और एक बड़े धार्मिक व्यक्तित्व के बीच तनाव पैदा कर दिया है। माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक नोटिस भेजा है। इस नोटिस में उनसे 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया है। सवाल यह है कि उन्होंने अपने नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ की उपाधि क्यों लिखी, जबकि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इस नोटिस के बाद पूरे मेला क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई है। साधु-संत, श्रद्धालु और आम लोग सभी इस मुद्दे पर अपनी-अपनी राय रख रहे हैं।

मौनी अमावस्या से शुरू हुआ विवाद

माघ मेला का सबसे बड़ा स्नान पर्व मौनी अमावस्या माना जाता है। इस दिन संगम पर लाखों श्रद्धालु डुबकी लगाते हैं। रविवार को भी संगम क्षेत्र में भारी भीड़ थी। इसी दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिष्यों के साथ शोभायात्रा निकालते हुए संगम नोज की ओर जा रहे थे। वे पहिया लगी पालकी पर सवार थे। पुलिस ने उनकी शोभायात्रा को रास्ते में रोक दिया। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई। स्वामी और उनके शिष्यों ने इसे अपना अपमान बताया। वहीं प्रशासन ने इसे सुरक्षा से जुड़ा मामला कहा।

प्रशासन का पक्ष क्या है

मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल ने मीडिया से बात करते हुए साफ कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को स्नान करने से नहीं रोका गया। प्रशासन ने केवल आग्रह किया था। आपत्ति सिर्फ पहिया लगी पालकी पर थी। संगम नोज पर उस समय श्रद्धालुओं की बहुत भीड़ थी। अगर पालकी उस भीड़ में जाती, तो भगदड़ या किसी हादसे का खतरा हो सकता था। प्रशासन का कहना है कि लोगों की सुरक्षा सबसे पहले है। इसी कारण पुलिस ने शोभायात्रा को रोका।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की नाराजगी

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस पूरे घटनाक्रम से काफी आहत नजर आए। उन्होंने कहा कि उनके साथ और उनके शिष्यों के साथ दुर्व्यवहार हुआ। उनका आरोप है कि पुलिस ने कुछ शिष्यों के साथ मारपीट भी की। इस घटना के बाद स्वामी अपने शिविर के सामने धरने पर बैठ गए। उन्होंने कहा कि यह केवल उनका नहीं, बल्कि पूरे संत समाज का अपमान है। धरने के दौरान उन्होंने प्रशासन के खिलाफ कड़ी बातें कहीं। उनके समर्थक भी बड़ी संख्या में शिविर के आसपास जमा हो गए।

नोटिस ने बढ़ाई हलचल

इस विवाद के बीच माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक नोटिस भेज दिया। इस नोटिस में उनसे पूछा गया है कि उन्होंने अपने नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ क्यों लगाया है। प्राधिकरण ने नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक मामले का हवाला दिया है। नोटिस के अनुसार, जब तक अदालत का अंतिम आदेश नहीं आ जाता, तब तक किसी को भी ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य मानकर पट्टाभिषेकित नहीं किया जा सकता।

24 घंटे में जवाब और सुधार का निर्देश

मेला प्राधिकरण ने नोटिस में साफ कहा है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को 24 घंटे के भीतर जवाब देना होगा। साथ ही उन्हें अपने शिविर में लगे बोर्ड से ‘शंकराचार्य’ शब्द हटाने या उसमें सुधार करने को कहा गया है। प्राधिकरण का कहना है कि नियम सभी के लिए बराबर हैं। अदालत में मामला लंबित होने के कारण किसी को भी खुद को शंकराचार्य बताने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट में क्या है मामला

प्राधिकरण ने जिस सिविल अपील का जिक्र किया है, वह लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। यह मामला ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य पद से जुड़ा है। अदालत में अभी तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। इसी कारण प्रशासन का कहना है कि फिलहाल इस उपाधि का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। जब तक अदालत का आदेश नहीं आता, तब तक स्थिति यथावत रहेगी।

शोभायात्रा और पहिया लगी पालकी पर विवाद

रविवार को जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिविर से पहिया लगी पालकी पर सवार होकर निकले, तो उनके साथ बड़ी संख्या में शिष्य थे। पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर रास्ता रोका। शिष्यों का आरोप है कि पुलिस ने जबरन रोका और कुछ लोगों को हिरासत में ले लिया। वहीं पुलिस का कहना है कि शिष्यों ने बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश की। इस दौरान झड़प हुई और हालात बिगड़ गए।

हिरासत और धरना

पुलिस ने स्वामी के कुछ शिष्यों को हिरासत में लिया। इनमें प्रतक्षचैतन्य मुकुंदानंद गिरि का नाम भी सामने आया है। शिष्यों की गिरफ्तारी से नाराज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठ गए। उन्होंने कहा कि जब तक उनके शिष्यों को छोड़ा नहीं जाएगा और उनसे माफी नहीं मांगी जाएगी, तब तक वे धरना खत्म नहीं करेंगे। यह धरना कई घंटों तक चला और मेला क्षेत्र में तनाव बना रहा।

श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया

इस पूरे मामले पर श्रद्धालुओं की मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ लोगों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया। उनका कहना है कि संतों का सम्मान होना चाहिए। वहीं कुछ लोगों ने प्रशासन के फैसले को सही बताया। उनका कहना है कि इतनी भीड़ में सुरक्षा नियम जरूरी हैं। अगर किसी भी तरह की ढील दी जाती, तो बड़ा हादसा हो सकता था।

मीडिया के सामने दोनों पक्ष

सोमवार दोपहर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मीडिया से बात की। उन्होंने अपने साथ हुई घटना का विस्तार से जिक्र किया। उन्होंने पुलिस और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। इसके बाद पुलिस और प्रशासन के उच्च अधिकारियों ने भी मीडिया के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि किसी के साथ जानबूझकर गलत व्यवहार नहीं किया गया। सब कुछ सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया गया।

माघ मेला प्रशासन की सख्ती

माघ मेला प्रशासन का कहना है कि मेला क्षेत्र में नियमों का पालन जरूरी है। लाखों लोगों की जान की जिम्मेदारी प्रशासन पर होती है। ऐसे में किसी भी तरह का जोखिम नहीं लिया जा सकता। चाहे वह आम श्रद्धालु हो या कोई बड़ा धर्माचार्य। नियम सभी के लिए एक जैसे हैं।

आगे क्या होगा

अब सबकी नजरें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के जवाब पर टिकी हैं। 24 घंटे के भीतर उन्हें नोटिस का जवाब देना है। यह देखना दिलचस्प होगा कि वे क्या जवाब देते हैं और क्या अपने बोर्ड में कोई बदलाव करते हैं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले का फैसला भी इस विवाद की दिशा तय करेगा।

निष्कर्ष

प्रयागराज माघ मेला का यह विवाद केवल एक शोभायात्रा तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब धार्मिक उपाधि, प्रशासनिक नियम और सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दों से जुड़ गया है। एक तरफ संत समाज की भावनाएं हैं, तो दूसरी तरफ प्रशासन की जिम्मेदारियां। आने वाले दिनों में इस मामले पर क्या फैसला होता है, यह सभी के लिए अहम होगा। फिलहाल मेला क्षेत्र में शांति बनाए रखने की कोशिश की जा रही है, ताकि श्रद्धालु बिना डर और परेशानी के अपने धर्म कर्म पूरे कर सकें।

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