प्रतिबंध हटाओ, समझौता पाओ: ईरान की नई पेशकश से बढ़ी दुनिया की धड़कनें
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर से सुर्खियों में है। दोनों देशों के रिश्ते लंबे समय से खट्टे रहे हैं। लेकिन अब एक नया मोड़ आया है। ईरान ने अमेरिका के सामने साफ शब्दों में कहा है—अगर प्रतिबंध हटाओ, तो हम आज ही परमाणु समझौते पर बात करने को तैयार हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब हालात पहले से ज्यादा नाजुक हैं। दुनिया की निगाहें अब वॉशिंगटन पर टिक गई हैं।
ईरान का सीधा संदेश: गेंद अब अमेरिका के पाले में
ईरान के उप विदेश मंत्री मजीद तख्त रवांची ने हाल ही में एक इंटरव्यू में साफ कहा कि अगर अमेरिका प्रतिबंधों में राहत देने पर तैयार हो, तो ईरान परमाणु कार्यक्रम पर समझौते के लिए आगे बढ़ सकता है। उनका कहना था कि अब फैसला अमेरिका को करना है।
उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ईमानदारी दिखाए, तो रास्ता खुल सकता है। यह बयान साधारण नहीं है। यह सीधे अमेरिका के नेतृत्व को चुनौती भी है और एक मौका भी।
ईरान लंबे समय से कहता रहा है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध उसकी जनता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। तेल बेचने में दिक्कत हो रही है। व्यापार रुक गया है। महंगाई बढ़ी है। ऐसे में ईरान अब साफ शर्त रख रहा है।
अमेरिका की सख्त चेतावनी
दूसरी ओर अमेरिका का रुख अभी भी कड़ा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दो टूक कहा है कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कूटनीतिक हल चाहते हैं। लेकिन अमेरिका किसी भी कीमत पर परमाणु हथियारों से लैस ईरान को बर्दाश्त नहीं करेगा। उनका कहना था कि ऐसा हुआ तो यह पूरे क्षेत्र और दुनिया की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा होगा।
इन बयानों से साफ है कि दोनों देश एक-दूसरे को संदेश दे रहे हैं। शब्दों की जंग जारी है। लेकिन दरवाजा अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।
मध्य पूर्व में बढ़ी सैन्य हलचल
तनाव सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है। खबर है कि अमेरिका मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। एक और अमेरिकी विमानवाहक पोत इस क्षेत्र में तैनात किया जा रहा है।
यह कदम साफ संकेत देता है कि अमेरिका सतर्क है। वह किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहता है। इससे ईरान पर दबाव बढ़ सकता है।
ईरान ने पहले भी कहा है कि वह दबाव में झुकने वाला नहीं है। लेकिन बातचीत के दरवाजे खुले रखे हैं।
ओमान में हुई अहम बैठक
हाल ही में ओमान में दोनों देशों के प्रतिनिधियों की मुलाकात हुई थी। ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल हुए। अमेरिका की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ मौजूद थे।
सूत्रों के अनुसार, ट्रंप के दामाद जारेड कुश्नर भी इस प्रक्रिया का हिस्सा रहे। हालांकि यह बातचीत औपचारिक नहीं थी। इसे परोक्ष वार्ता कहा गया। यानी दोनों देश सीधे आमने-सामने नहीं आए, लेकिन संदेशों का आदान-प्रदान हुआ।
यह बैठक भले ही चुपचाप हुई हो, लेकिन इसके संकेत बड़े हैं। दोनों पक्ष रास्ता तलाश रहे हैं।
2015 का परमाणु समझौता क्या था
ईरान और विश्व शक्तियों के बीच जुलाई 2015 में एक बड़ा समझौता हुआ था। इसे संयुक्त व्यापक कार्ययोजना कहा गया। इस समझौते के तहत ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को 3.67 प्रतिशत तक सीमित करने पर सहमति दी थी। साथ ही उसने अपने भंडार को 300 किलोग्राम तक घटाने का वादा किया था।
बदले में ईरान पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंध हटाए गए थे। दुनिया को लगा कि संकट टल गया।
लेकिन 2018 में अमेरिका ने इस समझौते से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद हालात फिर बिगड़ गए। ईरान ने भी अपने कार्यक्रम में बदलाव शुरू कर दिए। भरोसा टूट गया।
जिनेवा में होने वाली अगली वार्ता
रिपोर्ट के मुताबिक अगली दौर की बातचीत स्विट्जरलैंड के जिनेवा में हो सकती है। मंगलवार को यह वार्ता होने की संभावना जताई गई है।
इसमें फिर से अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ शामिल हो सकते हैं। जारेड कुश्नर की मौजूदगी भी संभव है। अगर यह बैठक होती है, तो यह एक बड़ा कदम होगा।
दुनिया देखेगी कि क्या इस बार कोई ठोस नतीजा निकलता है या फिर बातचीत सिर्फ बयानबाजी बनकर रह जाती है।
ट्रंप का बयान और इजरायल से मुलाकात
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी हाल ही में कहा है कि ईरान के साथ समझौता जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो हालात बहुत गंभीर हो सकते हैं।
उन्होंने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से अपनी मुलाकात को सकारात्मक बताया। यह मुलाकात भी अहम मानी जा रही है। इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करता रहा है।
इजरायल का कहना है कि ईरान पर भरोसा नहीं किया जा सकता। ऐसे में ट्रंप की यह कूटनीतिक संतुलन की कोशिश आसान नहीं होगी।
ऑपरेशन मिडनाइट हैमर की गूंज
जून 2025 में अमेरिका ने ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के तहत ईरान के फोर्दो, नतांज और इस्फहान स्थित परमाणु ठिकानों पर हमला किया था। यह कदम बहुत बड़ा था।
ईरान ने इसकी कड़ी निंदा की थी। उसने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताया। उस घटना के बाद से तनाव और बढ़ गया।
यह हमला दोनों देशों के रिश्तों में गहरी दरार छोड़ गया। अब जब बातचीत की बात हो रही है, तो उस घटना की छाया अभी भी मौजूद है।
आम लोगों पर क्या असर
जब बड़े देश लड़ते हैं, तो सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ता है। ईरान में महंगाई बढ़ी है। दवाइयों की कमी की खबरें आती रहती हैं। नौकरियां कम हुई हैं।
अमेरिका में भी लोग नहीं चाहते कि नया युद्ध शुरू हो। युद्ध महंगा होता है। जान का नुकसान होता है। अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
इसलिए कई लोग चाहते हैं कि दोनों देश बैठकर बात करें। झगड़ा कम करें। समाधान निकालें।
क्या यह सच में मौका है
ईरान का प्रस्ताव एक तरह से खुला निमंत्रण है। वह कह रहा है कि प्रतिबंध हटाओ, तो हम आगे बढ़ेंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका इस पर भरोसा करेगा।
अमेरिका कहता है कि पहले ईरान भरोसा दिखाए। ईरान कहता है कि पहले प्रतिबंध हटाओ। यही असली पेच है।
अगर दोनों एक साथ कदम बढ़ाएं, तो रास्ता निकल सकता है। लेकिन अगर दोनों इंतजार करते रहे, तो स्थिति और बिगड़ सकती है।
आगे का रास्ता
जिनेवा की संभावित बैठक बहुत अहम होगी। वहां की बातचीत तय करेगी कि हालात सुधरेंगे या और बिगड़ेंगे।
दुनिया के कई देश चाहते हैं कि यह मुद्दा शांति से सुलझे। तेल की कीमतें, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता सब इससे जुड़ी हैं।
यह सिर्फ दो देशों का मामला नहीं है। यह पूरी दुनिया की चिंता है।
निष्कर्ष
ईरान ने साफ संदेश दिया है। प्रतिबंध हटाओ और समझौते की राह खोलो। अमेरिका ने भी कहा है कि वह परमाणु हथियार नहीं बनने देगा। दोनों अपनी-अपनी जगह खड़े हैं।
अब देखना यह है कि कौन पहला कदम उठाता है। क्या जिनेवा में नई शुरुआत होगी। या फिर बयानबाजी ही चलती रहेगी।
दुनिया इंतजार कर रही है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इस बार बात बने। क्योंकि जब देश बात करते हैं, तो युद्ध टलते हैं। और जब युद्ध टलते हैं, तो इंसानियत जीतती है।