डेटा की ताकत से बदली तस्वीर: भारत ने बेरोजगारी पर कसा शिकंजा, दुनिया को दिया संकेत
वर्तमान में, विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं रोजगार की चिंता में हैं। अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को भी बेरोजगारी की समस्या है। लेकिन भारत से आई एक रिपोर्ट ने उम्मीद जगाई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर 2025 की अंतिम तिमाही में कम हो जाएगी। यह गिरावट छोटी है, लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण सन्देश निकलता है। यह दिखाता है कि भारत का श्रम बाजार धीरे-धीरे संभल रहा है और देश ने डेटा को सही तरीके से इस्तेमाल किया है।
दुनिया में बदलाव, अमेरिका
अमेरिका से पहले बात करें। साल 2025–26 की शुरुआत में बेरोजगारी दर 4.3–4.6 प्रतिशत रही। अक्टूबर 2021 के बाद यह सबसे ऊंचा स्तर माना जाता है। इसके बावजूद, यह दर लगभग अमेरिका के पुराने औसत चार से पांच प्रतिशत के आसपास है। इसलिए यह बहुत बड़ा संकट नहीं है।
अभी भी संकेत स्पष्ट हैं। भी, विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को रोजगार पर दबाव महसूस हो रहा है। पहले की तरह वहां काम नहीं होता। कंपनियां विचारपूर्वक लोगों को भर्ती कर रही हैं। बाजार कुछ अनिश्चित है। भारत के आंकड़े इस परिस्थिति में अलग कहानी बताते हैं।
भारत को राहत की खबर
भारत में बेरोजगारी दर 2025 की सितंबर तिमाही में 5.2 प्रतिशत थी। लेकिन दिसंबर तिमाही तक यह घटकर 4.8% हो गया था। यह दिखने में छोटी गिरावट है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा है। इसका अर्थ है कि अधिकांश लोगों को नौकरी मिली है या वे नौकरी की तलाश में सक्रिय हैं।
भारतीय सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में अक्टूबर से दिसंबर 2025 तक की स्थिति दिखाई दी गई है। रिपोर्ट बताती है कि लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR) बढ़ा है। इसका अर्थ है कि बहुत से लोग काम कर रहे हैं या काम की तलाश में हैं।
सरल शब्दों में, लोग घर बैठने के बजाय काम पर जा रहे हैं। यह किसी भी देश के लिए सकारात्मक संकेत है।
वेतनभोगी नौकरियों में कमी, चिंता का कारण
किंतु हर खबर पूरी तरह से अच्छी नहीं है। 15 साल और उससे अधिक उम्र के नियमित नौकरी करने वालों का प्रतिशत घट गया है। यह जुलाई से सितंबर 2025 तक 25.4% था। अप्रैल से जून तक यह 25.5% था। लेकिन अक्टूबर से दिसंबर 2025 तक यह 24.9 प्रतिशत रह गया था।
वेतनभोगी नौकरी का अर्थ है ऐसी नौकरी जिसमें एक नियमित मासिक भुगतान मिलता है। साथ में कुछ सुरक्षा प्रदान की जाती है। जैसे पेंशन, भविष्य निधि और अन्य सुविधाएं इसलिए ऐसी नौकरी अधिक सुरक्षित है।
नीति बनाने वालों को चिंता होती है जब इस तरह की नौकरियां कम होती हैं। क्योंकि लोग अपनी नियमित आय खो सकते हैं सरकार इस पर नजर रखनी चाहिए।
शहर और गांव दोनों पर प्रभाव
रिपोर्ट बताती है कि पुरुषों और महिलाओं के बीच शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में वेतनभोगी नौकरियों में कमी आई है। इसका अर्थ है कि यह परिवर्तन सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। देश भर में इसे देखा गया है।
लेकिन एक सुखद बात भी है। अकस्मिक कर्मचारियों की संख्या 18.9 प्रतिशत पर बनी हुई है। इसमें कोई बड़ी वृद्धि या कमी नहीं हुई। यह बताता है कि स्थिति कुछ स्थानों पर संतुलित रही है।
आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
स्व-रोजगार में देखा गया बदलाव सबसे दिलचस्प है। जुलाई से सितंबर 2025 तक स्व-रोजगार करने वालों की संख्या 55.8 थी। लेकिन अक्टूबर से दिसंबर 2025 तक यह 56.3% हो गया।
स्व-रोजगार का अर्थ है स्वयं काम करना। जैसे खेती करना, कोई सेवा देना, छोटी दुकान चलाना या छोटा व्यवसाय शुरू करना यह बदलाव दर्शाता है कि लोगों को नौकरी का इंतजार करने के बजाय स्वयं काम करना पसंद है।
भारत में स्टार्टअप संस्कृति विकसित हो रही है। शहरों के छोटे-छोटे शहरों में भी लोग ऑनलाइन काम कर रहे हैं। महिलाएं अपने घर से काम कर रही हैं। युवा लोग इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहे हैं। यह परिवर्तन धीरे-धीरे नौकरी के नए अवसर खुला रहा है।
कृषि क्षेत्र में अधिक सहभागिता
साथ ही कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढे हैं। 15 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में कृषि में काम करने वालों का प्रतिशत अक्टूबर से दिसंबर 2025 तक 43.2 प्रतिशत हो गया था। पिछली तिमाही में 42.2% था।
यह बढ़ोतरी सिर्फ गांवों में नहीं हुई थी। शहरों में भी कुछ लोग कृषि या संबंधित क्षेत्रों में वापस आ गए हैं। इस बदलाव में पुरुष और महिला दोनों शामिल हैं।
भारत का आधार कृषि है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को इस क्षेत्र में अधिक रोजगार मिलता है। इससे छोटे कस्बों में धन का प्रवाह होता है। मांग बढ़ती है। और इससे पूरी अर्थव्यवस्था को बल मिलता है।
ये आंकड़े क्या बताते हैं?
इन आंकड़ों को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। एक तरफ, बेरोजगारी दर में कमी आई है। लेकिन वेतनभोगी नौकरियां घटी हैं। लेकिन कृषि और स्वरोजगार में वृद्धि हुई है। इसका अर्थ है कि रोजगार का ढांचा परिवर्तित हो रहा है।
भारत जैसे बड़े देश में कोई परिवर्तन एक दिन में नहीं होता। यह शांत होता है। डेटा सरकारी योजनाओं का आधार है। स्किल डेवलपमेंट पर जोर है। छोटे उद्यमों को सहायता दी गई है। डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रमों ने भी नए अवसर पैदा किए हैं।
यदि देश सही डेटा का उपयोग करता है तो उसके फैसले मजबूत होते हैं। इसलिए इस रिपोर्ट को विशिष्ट माना जाता है।
आगे की दिशा
आगे क्या होगा? विशेषज्ञों का कहना है कि वेतनभोगी नौकरियों में फिर से बढ़ोतरी और बेहतर संकेत देगी। सरकार उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए। नए उद्यम खोलें। नवीन कंपनियां आएँ। इससे नियमित काम की संख्या बढ़ेगी।
साथ ही स्व-रोजगार का समर्थन भी आवश्यक है। छोटे उद्यमों को कम ब्याज पर कर्ज मिला। प्रेरणा मिली। बाजार में पहुँच मिली। ऐसा होने पर रोजगार का क्षेत्र और बढ़ेगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि के अलावा अन्य रोजगार भी बढ़ाने चाहिए। खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, हस्तशिल्प और छोटे उद्योगों के रूप में शहरों से पलायन कम होगा और केवल गांवों में काम मिलेगा।
भारत का विश्व को संदेश
भारत का आंकड़ा अनुमानित है जब बेरोजगारी अमेरिका जैसे देश में चर्चा का विषय है। यह दिखाता है कि बाधा हर जगह है, लेकिन सही नीति और मजबूत डेटा से राह मिल सकती है।
भारत की अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से विकसित हो रही है। युवा जनसंख्या अधिक है। काम करने की दृढ़ इच्छा है। यह शक्ति देश को आगे ले जा सकती है अगर अवसर मिलते रहें।
यह सिर्फ प्रतिशत की कहानी नहीं है। यह लाखों जीवनों की कहानी है। परिवार में हर नया काम नई उम्मीद लाता है। हर छोटा व्यवसाय घर की आय बढ़ाता है।
उत्कर्ष
2025 की अंतिम तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि भारत के श्रम बाजार में बदलाव है। बेरोजगारी में कमी आई है। लोग काम की तलाश में निकल पड़े हैं। कृषि और स्वरोजगार में वृद्धि हुई है। लेकिन वेतनभोगी नौकरियों में कमी चिंताजनक है।
संतुलन बनाने का अब समय है। सरकार, उद्योग और समाज एकजुट होना चाहिए। आने वाले वर्षों में यह चाल जारी रहेगी तो चित्र और स्पष्ट होगा।
भारत का डेटा शक्ति बनाने का प्रयास पूरी दुनिया देख रही है। यह सिर्फ शुरूआत है। मार्ग कठिन है। लेकिन कदम उठाए गए हैं।