रफ़ाल पर फिर भरोसा: क्यों भारत ने 114 नए लड़ाकू विमान खरीदने का बड़ा फैसला लिया?
भारत ने फिर से रफ़ाल लड़ाकू विमानों की खरीद की है। सरकार ने 3.6 लाख करोड़ रुपये के रक्षा खरीद प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जो सेना को मजबूत करेगा। इसमें 114 नए रफ़ाल वायुसेना के लिए और पी-8I नेप्च्यून वायुसेना के लिए शामिल हैं। यह निर्णय ऐसे समय किया गया है जब पड़ोसी देशों के साथ तनाव बढ़ा है और वायुसेना में लड़ाकू विमानों की संख्या कम होती जा रही है। सवाल उठता है कि आखिर रफ़ाल ही क्यों? आइए इसे सीधे समझते हैं।
रक्षा बजट में भारी वृद्धि
इस साल सरकार ने रक्षा बजट में १५% की बढ़ोतरी की है। अब रक्षा बजट करीब 85 अरब डॉलर है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि सरकार अधिक बलशाली सेना चाहती है।
उत्तरी और पश्चिमी सीमा पर चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं। सेना को इसलिए नवीनतम हथियार और विमान चाहिए। अभी वायुसेना में 29 फाइटर स्क्वॉड्रन हैं, जबकि 42 की जरूरत है। कई पुराने विमान बंद हो जाएंगे। नतीजतन, नए विमानों की जरूरत तेजी से बढ़ी है।
वायुसेना की शक्ति की कमी
अब भारतीय वायुसेना का विश्वसनीय मिग-21 सेवा से बाहर हो गया है। जैगुआर और मिग-29 के पुराने संस्करण भी आने वाले सालों में खत्म हो जाएंगे। मिराज-2000 को सुधार किया गया है, लेकिन यह भी बहुत पुराना नहीं है।
रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी का कहना है कि वायुसेना को स्क्वॉड्रन की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। कई स्क्वॉड्रन रिटायर हो जाएंगे। ऐसे में नए विमान जल्दी नहीं आते तो उनकी शक्ति और कम हो सकती है।
रफ़ाल सौदा का महत्व क्यों है?
Dassault Aviation द्वारा निर्मित RAF विमान पहले से ही भारतीय वायुसेना में हैं। 2016 में भारत ने 36 रफ़ाल विमान खरीदें। ये विमान अब सेवा में हैं और अच्छी तरह से काम कर रहे हैं।
नए समझौते के बाद भारत अब 176 रफ़ाल विमानों का मालिक होगा। इनमें से 36 पहले से ही सेवा में हैं, जबकि 26 रफ़ाल मरीन जेट नौसेना में ऑर्डर किए गए हैं। इस नए प्रस्ताव में 114 अतिरिक्त नए विमान शामिल हैं।
रक्षा सचिव राजेश कुमार ने कहा कि फ्रांस से बाहर पहली बार बड़े पैमाने पर रफ़ाल विमान बनाए जाएंगे। भारत कम से कम ४० से ५० प्रतिशत काम करेगा। यह सौदा सरकारों के बीच होगा। यह बिचौलिया नहीं होगा।
यह भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पारदर्शिता बनी रहेगी और समय बचेगा।
मेक इन इंडिया को प्रोत्साहित करें
सरकार चाहती है कि भारत रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर हो जाए। 114 में से 18 रफ़ाल फ्रांस से सीधे आ जाएंगे। बाकी ९० से अधिक विमान भारत में निर्मित होंगे। मेक इन इंडिया ने इसे बनाया जाएगा।
इससे देश में काम की संख्या बढ़ेगी। विकास होगा। इंजीनियरों को ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। भारत भविष्य में भी अच्छे विमान बना सकेगा।
हालाँकि, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि भारत को पूरी तरह से विमान बनाना और अच्छा होता। लेकिन फिलहाल RAFal को सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है।
US F-35 क्यों नहीं?
कुछ खबरें थीं कि भारत अमेरिका से एफ-35 विमान पा सकता है। लेकिन रफ़ाल को ही सरकार ने चुना।
Манोज जोशी का कहना है कि आज के लड़ाकू विमान सिर्फ मशीन नहीं हैं। उनके साथ पूरा सॉफ्टवेयर, रखरखाव और उपकरणों का सिस्टम आता है। बाद में किसी देश ने पाबंदी लगा दी तो समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
भारत के लंबे समय से फ्रांस के साथ अच्छे रिश्ते रहे हैं। रफ़ाल पहले से ही काम कर रहा है। सरकार ने इसलिए उसी पर भरोसा दिखाया।
पुराने सौदे पर पुनर्विचार?
रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी का कहना है कि यह नवीनतम सौदा बिल्कुल नवीन नहीं है। 2007-08 में 126 विमानों की बातचीत शुरू हुई थी। एमएमआरसीए इसका नाम था। तब भी रफ़ाल चुना गया था।
लेकिन बाद में सरकार बदल गई और सौदा रद्द हो गया। 2016 में सीधे 36 रफ़ाल खरीदे गए। 114 विमानों की मंज़ूरी को अब पुराने योजना की वापसी बताया जा रहा है।
इस बार, अधिकांश काम भारत में होगा।
करगिल के बाद रफ़ाल का इतिहास
1999 के करगिल युद्ध के बाद भारतीय वायुसेना को नवीनतम लड़ाकू विमानों की आवश्यकता हुई। मिराज-2000 ने उस समय अच्छा प्रदर्शन किया था। दसॉ, एक फ्रांसीसी कंपनी, भी इसे बनाया था।
हर मौसम में मिराज काम कर सकता था। उसने दूर से हमला किया होगा। वह विश्वसनीय साबित हुआ।
तब सरकार ने बेहतर विमान की जरूरत महसूस की। एमएमआरसीए योजना इसी विचार से शुरू हुई। रफ़ाल को छह विमानों से चुना गया।
2012 से बातचीत जारी रही है। 2016 में 36 रफ़ाल का सौदा हुआ था。 अब उसी रास्ते पर चलना जा रहा है।
हालिया तनाव और विफलता
पिछले वर्ष भारत और पाकिस्तान में तनाव बढ़ा है। तब रफ़ाल का नाम चर्चा में था। पाकिस्तान ने भारतीय विमानों को गिरा दिया। इन दावों को भारत ने स्वीकार नहीं किया।
कुछ लोगों ने इसकी तुलना चीन के जे-10 विमान से की। लेकिन सरकार ने नुकसान की आधिकारिक जानकारी नहीं दी।
इनमें से एक स्पष्ट है। भारत हवाई बल को कम नहीं करना चाहता।
तेजस की धीमी गति
भारत का तेजस भी हल्का लड़ाकू विमान है। लेकिन यह परियोजना पिछले कई वर्षों से चल रही है। 1981 से शुरू हुए इस कार्यक्रम में अभी तक सिर्फ दो स्क्वॉड्रन हैं। तीसरा तैयार है।
वायुसेना की आवश्यकताओं को पूरा करने में देरी हुई है। इसलिए सरकार को विदेशी विकल्प का चयन करना होगा।
रफ़ाल को जल्दी लाना स्क्वॉड्रन की कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकता है।
अब क्या होगा?
रक्षा सचिव ने कहा कि 2028 से रफ़ाल मरीन में पानी की आपूर्ति शुरू होगी। कुछ ही सालों में वायुसेना को नए रफ़ाल भी मिलेंगे।
सरकार का मकसद स्पष्ट है। वायुसेना के 42 स्क्वॉड्रन पूरे करना देश की सीमा को सुरक्षित रखना। और रक्षा उत्पादों में स्वतंत्र होना।
Rafial का नवीनतम अध्याय सिर्फ खरीद पर नहीं है। यह रणनीति में है। यह भी बताता है कि भारत अपनी सुरक्षा पर गंभीर है।
यह निर्णय कितना सफल होगा, समय बताएगा। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि हवाई बल में कोई कमी नहीं होगी।