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गाजा से आगे ‘बोर्ड ऑफ पीस’: ट्रंप की नई पहल में 8 मुस्लिम देशों की एंट्री, दुनिया भर में तेज हुई बहस

दुनिया की राजनीति में एक बार फिर एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा युद्ध के बाद शांति की कोशिशों के लिए एक नया मंच बनाया है, जिसे “बोर्ड ऑफ पीस” कहा गया है। आठ बड़े मुस्लिम देशों ने इस बोर्ड में शामिल होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। यह फैसला के पीछे ट्रंप की बहुत बड़ी विश्वव्यापी योजना भी है, न सिर्फ गाजा।

सरल शब्दों में, ट्रंप विश्वव्यापी विवादों को हल करने के लिए एक नया दल बनाना चाहते हैं। इस समूह में सबसे शक्तिशाली देश और नेता होंगे। जब आठ मुस्लिम देशों ने इस बोर्ड में शामिल होने की खबर आई, तो समर्थकों और आलोचकों के बीच बहस शुरू हो गई। यह शांति की उम्मीद या संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर सवाल उठाता है।

“बोर्ड ऑफ पीस” क्या है?

गाजा युद्ध के बाद की स्थिति को देखने के लिए एक मंच है, जिसे “बोर्ड ऑफ पीस” कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने विशेष आदेश देकर यह बोर्ड बनाया है। गाजा में युद्ध के बाद, इसका पहला काम हालात को नियंत्रित करना है। बोर्ड का कार्यकाल 2027 तक है।

ट्रंप ने कहा कि न्यायाधीशों को एक साथ बैठना चाहिए अगर दुनिया में शांति होगी। इस बोर्ड को उसी विचार से बनाया गया है। ताकि जल्दी और स्पष्ट फैसले लिए जा सकें, इसमें कम बैठकें होंगी।

बोर्ड के आठ मुस्लिम देश

इस बोर्ड में आठ मुस्लिम देशों की सूची बहुत चर्चा में है। इसमें शामिल हैं सऊदी अरब, तुर्किए, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, कतर और संयुक्त अरब अमीरात।

इन सभी देशों ने अपने-अपने प्रतिनिधि भेजे हैं। इन्हें लगता है कि गाजा में शांति के लिए एकजुट होना आवश्यक है। साथ ही, वे चाहते हैं कि फिलिस्तीनी लोग सम्मान और हक पाए।

ट्रंप ने गाजा को छोड़ दिया

ट्रंप गाजा पर अपना वर्तमान ध्यान केंद्रित करना नहीं चाहते। भविष्य में दुनिया के अन्य महत्वपूर्ण विवादों को हल करने के लिए वे इस मंच का उपयोग करना चाहते हैं। युद्ध, सीमा विवाद और राजनीतिक टकराव इसमें शामिल हो सकते हैं।

ट्रंप का कहना है कि वर्तमान वैश्विक संस्थाएं अक्सर धीमी होती हैं। ऐसे में एक छोटा लेकिन प्रभावशाली समूह अधिक प्रभावी हो सकता है। इसलिए उन्होंने विश्व भर में लोकप्रिय देशों को चुना है।

क्यों अमेरिका इसे कूटनीतिक जीत मानता है?

अध्यक्षता इस बोर्ड की सबसे विशिष्ट विशेषता है। डोनाल्ड ट्रंप खुद इसका आजीवन अध्यक्ष होगा। स्थायी सदस्य बनने के लिए प्रत्येक देश को एक अरब डॉलर का भुगतान करना होगा। अमेरिका ने इस रकम को गंभीर संकेत बताया है, हालांकि कई लोग हैरान हो गए हैं।

व्हाइट हाउस ने कहा कि बोर्ड को इतनी बड़ी राशि देने वाले देश हल्के में नहीं लेंगे। वे फैसलों पर उत्तरदायी रहेंगे। गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड भी अलग से बनाया गया है, ताकि वहां के मुद्दों पर तुरंत ध्यान दिया जा सके।

सऊदी अरब की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?

ट्रंप ने सऊदी अरब को इस पहल में शामिल करने को बड़ी सफलता बताया है। लंबे समय से ट्रंप ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से इस बोर्ड में आने की अपील की है। अमेरिका ने रियाद की सहमति के बाद इसे कूटनीतिक जीत बताया है।

पश्चिम एशिया में सऊदी अरब एक बड़ा और शक्तिशाली देश है। उसके सहयोग से बोर्ड को बल मिलता है। US मानता है कि इससे क्षेत्र में स्थिरता होगी।

रूस की एंट्री के बाद बढ़ी उत्सुकता

इस बीच, ट्रंप ने एक और महत्वपूर्ण घोषणा की। उनका कहना था कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता स्वीकार कर लिया है। समाचार के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया बहस शुरू हुई।

ट्रंप ने हल्के मजाक में कहा कि बोर्ड में असली शक्ति वाले लोग होंगे। यदि सिर्फ कमजोर लोग शामिल होंगे, तो कोई परिणाम नहीं होगा। कुछ लोग उनके बयान को घमंड बताते हैं, जबकि दूसरे इसे साफगोई बताते हैं।

पश्चिमी देशों की तेजी से बढ़ती चिंता

ट्रंप की इस पहल से बहुत से पश्चिमी देश नाराज हैं। राजनयिकों का कहना है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र की सामान्य भूमिका को कमजोर कर सकता है। उन्हें डर है कि इससे विश्वव्यापी नियम बिगड़ सकते हैं।

स्लोवेनिया के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनका देश इस बोर्ड में शामिल नहीं होगा। उन्हें लगता है कि इसका दायरा बहुत बड़ा है और यह संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा व्यवस्था को खराब कर सकता है।

मुसलमान देशों का संयुक्त संदेश

बोर्ड के आठ मुस्लिम देशों ने एक संयुक्त बयान जारी किया है। उनका कहना था कि वे स्वतंत्र राज्य के अधिकार और फिलिस्तीनी लोगों की स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं। न्याय के बिना शांति संभव नहीं है, वे कहते हैं।

इन देशों का मानना है कि यह कार्रवाई पश्चिम एशिया में स्थिरता और सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। स्थिति बेहतर हो सकती है अगर सभी पक्ष ईमानदारी से काम करें।

कितने देशों को निमंत्रण मिला?

जानकारी के अनुसार, लगभग 60 देशों को “बोर्ड ऑफ पीस” में शामिल होने का न्योता भेजा गया है। इनमें शामिल हैं इजरायल, अर्जेंटीना, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, हंगरी, कजाकिस्तान, कोसोवो, मोरक्को और वियतनाम।

वहीं स्वीडन, नॉर्वे और इटली ने बोर्ड को छोड़ दिया है। स्पेन कहता है कि यूरोपीय देश इस पर मिलकर निर्णय लेंगे।

पोप को भी निमंत्रण

पोप लियो को भी बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्योता भेजा गया है, जो इस कदम की गम्भीरता को स्पष्ट करता है। वेटिकन ने कहा कि इस प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है। पूरी समीक्षा के बिना कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा।

आगे क्या होगा?

अब सबका ध्यान असल में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की शक्ति पर है। क्या यह गाजा को शांत करेगा? क्या यह दुनिया भर के अन्य विवादों को हल कर सकेगा? जवाब देने में कुछ समय लगेगा।

फिलहाल, ट्रंप की इस पहल ने सभी को विचार करने पर मजबूर कर दिया है। कुछ लोग इसे जोखिम भरा उपयोग बताते हैं, वहीं दूसरे इसे नई उम्मीद बताते हैं। आने वाले वर्षों से पता चलेगा कि यह बोर्ड इतिहास में कैसे याद किया जाएगा।

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