I PAC loan story

I-PAC के लोन की कहानी में बड़ा खुलासा, ₹13 करोड़ देने वाली कंपनी निकली फर्जी

राजनीति की दुनिया में रणनीति बनाने वाली मशहूर कंसल्टेंसी कंपनी Indian Political Action Committee यानी I-PAC एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला सिर्फ राजनीति का नहीं, बल्कि पैसों और कागज़ों का है। एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसे सुनकर हर कोई चौंक गया है। कंपनी ने दावा किया कि उसने रोहतक की एक फर्म से ₹13.50 करोड़ का लोन लिया, लेकिन जांच में पता चला कि वह कंपनी कागज़ों में भी ठीक से मौजूद नहीं थी।

यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है, जब I-PAC पहले से ही जांच एजेंसियों की नजर में है। प्रवर्तन निदेशालय यानी Enforcement Directorate की कार्रवाई के बाद यह मामला और भी गंभीर हो गया है। सवाल अब साफ है। क्या I-PAC ने सच कहा था या कागज़ों में कोई बड़ा खेल हुआ है?

I-PAC क्या है और क्यों है चर्चा में

I-PAC की शुरुआत अप्रैल 2015 में पटना से हुई थी। यह कंपनी चुनावी रणनीति और राजनीतिक सलाह के लिए जानी जाती है। कई बड़े नेताओं और दलों के साथ काम कर चुकी यह संस्था खुद को प्रोफेशनल और साफ-सुथरी बताती रही है। फरवरी 2022 में इसका रजिस्टर्ड ऑफिस कोलकाता ट्रांसफर कर दिया गया।

कंपनी के डायरेक्टर और शेयरधारक शुरू से वही रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख नाम है इसके सह-संस्थापक Prateek Jain का। लेकिन अब कंपनी का नाम अच्छे कामों से नहीं, बल्कि एक विवादित लोन के कारण सुर्खियों में है।

₹13.50 करोड़ के लोन का दावा

दस्तावेजों के अनुसार, I-PAC ने 17 दिसंबर 2021 को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज़ यानी ROC के सामने एक जानकारी दी। इसमें बताया गया कि कंपनी ने रोहतक की ‘रामासेतु इंफ्रास्ट्रक्चर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ से ₹13.50 करोड़ का अनसिक्योर्ड लोन लिया है। अनसिक्योर्ड लोन का मतलब होता है ऐसा कर्ज, जिसके बदले कोई गारंटी नहीं दी जाती।

इतना ही नहीं, जून 2025 में दी गई एक और जानकारी में I-PAC ने कहा कि उसने इस लोन में से ₹1 करोड़ चुका दिया है। अब ₹12.50 करोड़ अभी बाकी हैं। सुनने में यह सब सामान्य लगता है, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

कंपनी का नाम, लेकिन अस्तित्व नहीं

जब इस लोन देने वाली कंपनी की जांच की गई, तो सच्चाई सामने आई। ROC के रिकॉर्ड में ‘रामासेतु इंफ्रास्ट्रक्चर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कोई कंपनी कभी रजिस्टर ही नहीं हुई थी। यानी जिस कंपनी से लोन लेने का दावा किया गया, वह कानूनी तौर पर मौजूद ही नहीं थी।

I-PAC ने अपने दस्तावेजों में जिस पते का जिक्र किया था, वह रोहतक का अशोका प्लाजा था। जांच टीम वहां भी पहुंची। वहां न तो ऐसी कोई कंपनी मिली और न ही किसी को इसके बारे में जानकारी थी।

मिलता-जुलता नाम, लेकिन अलग कहानी

जांच के दौरान एक और बात सामने आई। उसी पते पर ‘रामसेतु इंफ्रास्ट्रक्चर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की एक कंपनी जरूर दर्ज थी। यह कंपनी अक्टूबर 2013 में बनी थी। लेकिन अगस्त 2018 में ही इसे ROC ने बंद कर दिया था। इसे कानूनी भाषा में स्ट्राइक ऑफ कहा जाता है।

इसका मतलब साफ है। जिस कंपनी का नाम I-PAC ने लिया, वह या तो कभी बनी ही नहीं या फिर पहले ही बंद हो चुकी थी। और लोन का दावा साल 2021 का है। यानी कंपनी के बंद होने के करीब तीन साल बाद का।

जमीन पर भी नहीं मिले सबूत

अशोका प्लाजा के मालिक सुनील गोयल और वहां के मैनेजर सतवीर ने भी साफ कहा कि वहां रामसेतु या रामासेतु नाम की कोई कंपनी काम करते हुए उन्होंने नहीं देखी। कई सालों से उस बिल्डिंग में अलग-अलग ऑफिस आए और गए, लेकिन ऐसा कोई नाम याद नहीं है।

यह बयान जांच को और मजबूत बनाता है। क्योंकि अगर कंपनी वहां होती, तो किसी न किसी को उसकी जानकारी जरूर होती।

शेयरधारकों ने भी किया इनकार

ROC रिकॉर्ड में जिन लोगों के नाम इस कंपनी के शेयरधारक के तौर पर दर्ज हैं, उन्होंने भी चौंकाने वाली बातें कहीं। इनमें विक्रम मुंजाल, संदीप राणा, विजेंदर, बलजीत जांगड़ा, प्रदीप कुमार और जगबीर सिंह शामिल हैं।

इन सभी ने कहा कि कंपनी कुछ सालों में ही बंद हो गई थी। उनका I-PAC से कोई लेनदेन नहीं हुआ। संदीप राणा ने बताया कि कंपनी बनी जरूर थी, लेकिन कोई काम नहीं हुआ। जल्द ही उसे बंद कर दिया गया। वहीं विजेंदर ने कहा कि कंपनी जमीन के कारोबार के लिए बनाई गई थी, लेकिन एक सौदा खराब होने के बाद सब खत्म हो गया।

आठ और कंपनियां, लेकिन कोई सबूत नहीं

जांच यहीं नहीं रुकी। अधिकारियों ने मिलते-जुलते नाम वाली आठ दूसरी कंपनियों के रिकॉर्ड भी खंगाले। लेकिन कहीं भी 2021 या उसके बाद ₹13.50 करोड़ के ऐसे किसी लेनदेन का जिक्र नहीं मिला।

इससे साफ हो गया कि I-PAC के दस्तावेजों में जिस लोन का दावा किया गया है, उसकी सच्चाई पर बड़ा सवाल है। अब यह सिर्फ गलती नहीं, बल्कि गंभीर मामला बनता जा रहा है।

ED की कार्रवाई और राजनीतिक रंग

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में ED की कार्रवाई भी जुड़ी है। मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में ED ने I-PAC के ऑफिस और प्रतीक जैन के घर पर छापा मारा था। इस कार्रवाई के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल मच गई।

राज्य की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने इस कार्रवाई को राजनीतिक बदले की भावना बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार एजेंसियों का गलत इस्तेमाल कर रही है। लेकिन अब लोन से जुड़ा यह नया खुलासा सामने आने के बाद बहस और तेज हो गई है।

I-PAC के अधिकारी चुप क्यों हैं

मामले पर प्रतिक्रिया के लिए जब प्रतीक जैन से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। ईमेल और फोन कॉल दोनों का कोई उत्तर नहीं मिला। कंपनी की चार्टर्ड अकाउंटेंट पूनम चौधरी और कंपनी सेक्रेटरी तरुणा कालरा ने भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। अगर सब कुछ साफ है, तो जवाब देने से क्यों बचा जा रहा है?

कंपनी की साख पर बड़ा असर

I-PAC जैसी कंपनी, जो दूसरों को रणनीति और साफ छवि की सलाह देती है, खुद अब संदेह के घेरे में है। फर्जी या गैर-मौजूद कंपनी से लोन का दावा होना कोई छोटी बात नहीं है। इससे कंपनी की साख पर गहरा असर पड़ सकता है।

नियामक एजेंसियां अब इस मामले को और गहराई से देख सकती हैं। अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो I-PAC को कानूनी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

आगे क्या हो सकता है

अब सबकी नजर जांच एजेंसियों पर है। क्या ED या दूसरी एजेंसियां इस लोन मामले की अलग से जांच करेंगी? क्या I-PAC कोई सफाई देगा? ये सवाल अभी खुले हैं।

लेकिन इतना तय है कि ₹13.50 करोड़ के इस कथित लोन ने I-PAC की छवि को बड़ा झटका दिया है। राजनीति की चालें सिखाने वाली इस कंपनी के अपने कदम अब सवालों में हैं। आने वाले दिनों में इस कहानी में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।

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